मेरा रविवार कहाँ गया
"पेट के आग के सामने ये ठण्ड कैसा साहब ?" ऐसा बोला मानो उल्टा नीरज से ही प्रश्न कर रहा हो।
"आज तो रविवार है। छुटी नहीं मिलती है क्या ?" नीरज उत्सुकतावश दूसरा प्रश्न कर बैठा।
"चूल्हा कैसे जलेगा साहब ? हम मजदूर कमाते है तो खाते हैं। नहीं काम करेंगे तो बच्चे भूखे सो जायेंगे। दिनभर कमाते हैं तो शाम की चूल्हा जलती है। हमलोगों का कोई रविवार नहीं, कोई छुटी नहीं है साहब।"
इसके जबाव के सामने नीरज बिल्कुल निरुतर हो गया था। वह चुपचाप इस ठण्ड में कार्य करते हुए मजदूर को छोड़कर आगे बढ गया। परन्तु हथोड़े की आवाज अभी भी कानो में सुनाई दे रही थी। एक - एक हथोड़े की आवाज कानों में ऐसे गूंज रही थी, मानो ये मजदूर प्रश्न कर रहे थे कि "मेरा रविवार कहाँ गया ?"
मौलिक एवं अप्रकाशित
राजीव नयन कुमार
शिक्षक एवं रंगकर्मी
ओबरा औरंगाबाद
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