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Monday, January 7, 2019

मेरा रविवार कहाँ गया


मेरा रविवार कहाँ गया

सर्द हवाओं का झोंका मानो हड्डी को पिघला रही थी । रविवार होने के चलते सबलोग अपने अपने घरो में गरम गरम चाय की चुस्कियों के साथ टी वी सेट से चिपके हुए थे। सूरज अपनी नरम किरणों से थोड़ी गर्माहट देने का असफल प्रयास कर रहा था। इसी बीच ठक ठक की आवाज नीरज को बरबस अपने तरफ खिंच रहा था। ठिठुरते हुए नीरज उस आती हुई आवाज के तरफ बढ़ चला। निर्माणाधीन अपार्टमेन्ट में कार्य करते मजदूर । इन्ही के हथोड़े की आवाज गूंज रही थी। तन पर कपडे नहीं। ठिठुरते मजदूर से नीरज आखिर पूछ ही बैठा, "तुम्हें ठण्ड नहीं लगती क्या ?।"
"पेट के आग के सामने ये ठण्ड कैसा साहब ?" ऐसा बोला मानो उल्टा नीरज से ही प्रश्न कर रहा हो।
"आज तो रविवार है। छुटी नहीं मिलती है क्या ?" नीरज उत्सुकतावश दूसरा प्रश्न कर बैठा।
"चूल्हा कैसे जलेगा साहब ? हम मजदूर कमाते है तो खाते हैं। नहीं काम करेंगे तो बच्चे भूखे सो जायेंगे। दिनभर कमाते हैं तो शाम की चूल्हा जलती है। हमलोगों का कोई रविवार नहीं, कोई छुटी नहीं है साहब।"
इसके जबाव के सामने नीरज बिल्कुल निरुतर हो गया था। वह चुपचाप इस ठण्ड में कार्य करते हुए मजदूर को छोड़कर आगे बढ गया। परन्तु हथोड़े की आवाज अभी भी कानो में सुनाई दे रही थी। एक - एक हथोड़े की आवाज कानों में ऐसे गूंज रही थी, मानो ये मजदूर प्रश्न कर रहे थे कि "मेरा रविवार कहाँ गया ?"

मौलिक एवं अप्रकाशित
राजीव नयन कुमार
शिक्षक एवं रंगकर्मी
ओबरा औरंगाबाद

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