रामदीन काका
"साहब आपसे कोई मिलने आया है। वे अपना नाम रामदीन बता रहे हैं।"
"क्या..बोला..? रामदीन......? "
रामदीन नाम के साथ ही रविश को पंद्रह वर्ष पूर्व की सारी घटनाएँ एक दम से आँखों के सामने तैरने लगी।आज से पंद्रह वर्ष पूर्व अचानक पिताजी के मृत्यु से वह सदमे में था। बारहवी कक्षा का छात्र था। चार भाईयो में सबसे छोटा रविश को कुछ नहीं सूझ रहा था। सभी भाई एक एक कर अपने हाँथ खड़े कर दिए थे। उस समय रामदीन काका ही सामने आये थे। एक स्वर में उन्होंने मदद का दिलासा देकर मेरा होंसला बढाया था। कुछ दिनों तक वे मेरा आर्थिक मदद भी करते रहे। बाद में मैंने स्वयं बच्चो को पढाकर अपना खर्च निकालता रहा। रविश जिंदगी के संघर्ष की अतल गहराईयों में डूबता चला गया, कि तभी परिचारी की आवाज़ कानो से टकराई।
"साहब उन्हें अन्दर भेजूँ क्या ? "
"नहीं......नहीं......रुको ..... "
रविश स्वयं उठकर बाहर आया।
रामदीन काका के पैर छूते ही रविश को कुछ समझ में नहीं आया। हमेशा ठाठ बाट में रहनेवाले रामदीन काका के पैरो में चप्पल तक नहीं।
"काका आप ठीक हैं ना....? बेटे बहु सब सब ठीक है ना काका..? "
"हाँ बेटा सब ठीक है" कहते हुए रामदीन काका फफक कर रोने लगे। रविश को समझते देर नहीं लगी।
"काका मैं हूँ ना....।आज से आप मेरे साथ रहेंगे काका।"
रामदीन काका को सहारा देते हुए रविश गाड़ी में बैठाकर घर की ओर बढ़ चला।
मौलिक एवं अप्रकाशित
राजीव नयन कुमार