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Thursday, January 24, 2019

रामदीन काका

रामदीन काका
"साहब आपसे कोई मिलने आया है। वे अपना नाम रामदीन बता रहे हैं।" 
"क्या..बोला..? रामदीन......? "
रामदीन नाम के साथ ही रविश को पंद्रह वर्ष पूर्व की सारी घटनाएँ एक दम से आँखों के सामने तैरने लगी।आज से पंद्रह वर्ष पूर्व अचानक पिताजी के मृत्यु से वह सदमे में था। बारहवी कक्षा का छात्र था। चार भाईयो में सबसे छोटा रविश को कुछ नहीं सूझ रहा था। सभी भाई एक एक कर अपने हाँथ खड़े कर दिए थे। उस समय रामदीन काका ही सामने आये थे। एक स्वर में उन्होंने मदद का दिलासा देकर मेरा होंसला बढाया था। कुछ दिनों तक वे मेरा आर्थिक मदद भी करते रहे। बाद में मैंने स्वयं बच्चो को पढाकर अपना खर्च निकालता रहा। रविश जिंदगी के संघर्ष की अतल गहराईयों में डूबता चला गया, कि तभी परिचारी की आवाज़ कानो से टकराई।
"साहब उन्हें अन्दर भेजूँ क्या ? "
"नहीं......नहीं......रुको ..... "
रविश स्वयं उठकर बाहर आया।
रामदीन काका के पैर छूते ही रविश को कुछ समझ में नहीं आया। हमेशा ठाठ बाट में रहनेवाले रामदीन काका के पैरो में चप्पल तक नहीं। 
"काका आप ठीक हैं ना....? बेटे बहु सब सब ठीक है ना काका..? "
"हाँ बेटा सब ठीक है"  कहते हुए  रामदीन काका फफक कर रोने लगे। रविश को समझते देर नहीं लगी।
"काका मैं हूँ ना....।आज से आप मेरे साथ रहेंगे काका।"
रामदीन काका को सहारा देते हुए रविश गाड़ी में बैठाकर घर की ओर बढ़ चला।

मौलिक एवं अप्रकाशित
राजीव नयन कुमार

Tuesday, January 8, 2019

जूते और पैर

जूते और पैर

"माँ ....मैं ये जूते नहीं पहनूँगा। मुझे वुडलैंड के ही जूते चाहिए।" महंगे जूते की जिद्द में तमतमाते हुए अभिषेक ने बोला।
"जूते की अहमियत पैर को सुरक्षा प्रदान करना है बेटा"। माँ ने समझाने की कोशिश की।
"मैं कुछ नहीं जानता। मुझे चाहिए तो चाहिए।"गुस्से में अभिषेक तेजी से बाहर निकल गया।
"रुक जाओ बेटा......रुक जा...." माँ ने अभिषेक को रोकने की असफल प्रयास की।
अभिषेक गुस्से में बाज़ार की तरफ बढने लगा।
"भगवान् के नाम पर कुछ दे दे बाबु।" की आवाज़ के साथ ही अभिषेक अचानक रुक कर भिखारी की ओर देखा। भिखारी के दोनों पैर कटे हुए देखकर एक ही क्षण में जूते और पैर की अहमियत समझ में आ गई। पश्चाताप करते हुए अभिषेक घर की तरफ मुड़ गया।

मौलिक एवं अप्रकाशित
राजीव नयन कुमार
शिक्षक एवं रंगकर्मी
ओबरा औरंगाबाद


Monday, January 7, 2019

मेरा रविवार कहाँ गया


मेरा रविवार कहाँ गया

सर्द हवाओं का झोंका मानो हड्डी को पिघला रही थी । रविवार होने के चलते सबलोग अपने अपने घरो में गरम गरम चाय की चुस्कियों के साथ टी वी सेट से चिपके हुए थे। सूरज अपनी नरम किरणों से थोड़ी गर्माहट देने का असफल प्रयास कर रहा था। इसी बीच ठक ठक की आवाज नीरज को बरबस अपने तरफ खिंच रहा था। ठिठुरते हुए नीरज उस आती हुई आवाज के तरफ बढ़ चला। निर्माणाधीन अपार्टमेन्ट में कार्य करते मजदूर । इन्ही के हथोड़े की आवाज गूंज रही थी। तन पर कपडे नहीं। ठिठुरते मजदूर से नीरज आखिर पूछ ही बैठा, "तुम्हें ठण्ड नहीं लगती क्या ?।"
"पेट के आग के सामने ये ठण्ड कैसा साहब ?" ऐसा बोला मानो उल्टा नीरज से ही प्रश्न कर रहा हो।
"आज तो रविवार है। छुटी नहीं मिलती है क्या ?" नीरज उत्सुकतावश दूसरा प्रश्न कर बैठा।
"चूल्हा कैसे जलेगा साहब ? हम मजदूर कमाते है तो खाते हैं। नहीं काम करेंगे तो बच्चे भूखे सो जायेंगे। दिनभर कमाते हैं तो शाम की चूल्हा जलती है। हमलोगों का कोई रविवार नहीं, कोई छुटी नहीं है साहब।"
इसके जबाव के सामने नीरज बिल्कुल निरुतर हो गया था। वह चुपचाप इस ठण्ड में कार्य करते हुए मजदूर को छोड़कर आगे बढ गया। परन्तु हथोड़े की आवाज अभी भी कानो में सुनाई दे रही थी। एक - एक हथोड़े की आवाज कानों में ऐसे गूंज रही थी, मानो ये मजदूर प्रश्न कर रहे थे कि "मेरा रविवार कहाँ गया ?"

मौलिक एवं अप्रकाशित
राजीव नयन कुमार
शिक्षक एवं रंगकर्मी
ओबरा औरंगाबाद

Sunday, January 6, 2019

देहरी

देहरी

"अब मुझसे बर्दास्त नहीं होता राजेश। तुम्हारे माता पिता के ताने सुनते सुनते मैं तंग आ गयी हूँ।" बोलते बोलते रागिनी की आँखे डबडबा गयी।
 शादी के चार साल हो गए थे। इन चार सालो में रागिनी वह आँगन को भूल गयी थी जिस आँगन में अपने माता पिता के साथ बचपन बितायी थी। जिस माता पिता के गोद में पली बढ़ी वह सपना हो गया था। राजेश के माता पिता और रागिनी के माता पिता में दहेज़ को लेकर ऐसी कड़वाहट आयी कि रागिनी के लिए ससुराल मानो जेल हो गया था। 
पिछली बार जब रागिनी आपनी माँ से बात की थी तो बोलते बोलते रो पड़ी थी।
"अब तुम मुझे भूल जाना माँ। ये लोग मुझे वहां नहीं आने देंगे।"
आज इतने दिनों के बाद रागिनी बड़ी हिम्मत जुटाकर बोली थी। 
"कुछ दिन और रुक जाओ रागिनी। मैं माँ बाबूजी का दिल नहीं दुखा सकता।" संकोच करते हुए राजेश बोला।
"अच्छा। तुम्हारे माँ बाबुजी और मेरे.........मेरे कुछ नहीं।" इस प्रश्नभरी जबाब से राजेश बिल्कुल सकपका गया था।" मैंने तुम्हारे लिए सब कुछ बर्दास्त किया, तुम्हारे माता पिता के बनाये सारे नियम  को स्वीकार किया, इन चार वर्षो से अपनी उस माँ का चेहरा तक नहीं देखी जिसने पाल पोसकर बड़ा किया और तुम.....? " 
अपने बैग को ठीक करती हुई रागिनी एक साँस में बोल गयी। चार वर्षो की पीड़ा आज ज्वालामुखी बन कर लावा की तरह पिघलकर बाहर निकल रही थी। एक झटके में सारे नियम को तोड़ते हुए बैग उठाकर रागिनी अपने बीमार माता पिता से मिलने के लिए देहरी लांघ गई। एक क्षण में सारे नियमो से मुक्त होकर आन्तरिक सुकून महसूस कर रही थी। राजेश चुपचाप मूक खड़ा देखता रहा और रागिनी धीरे धीरे आँखों से ओझल हो गई।

मौलिक एवं अप्रकाशित
राजीव नयन कुमार
शिक्षक एवं रंगकर्मी
ओबरा औरंगाबाद
दूरभाष नो. 9835435502