एक बीघा ज़मीन (लघुकथा)
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आसमान आज अपने बांहों में मचलते हुए मेघो को भरसक समेटने का प्रयास कर रहा था। परंतु उमड़ते घुमड़ते मेघ आज कहां माननेवाले थे। मेघ अपनी पानी के बौछारों से गर्म धरती को इस तरह से वेध देना चाह रहा था कि उसके अंदर के सारे गर्मी भाप बनकर बाहर आ जाए। आज वो धरती के कलेजे को ठंडक पहुंचाने के लिए बेताब हो रहा था। इन मेघों को देखकर गोविंद का मन हर्ष से भर उठा। कांधे पर कुदाल लिए वो खेतो के तरफ बढ़ गया। उसके पीढियां, चौधरी रघुराज बाबू की सेवा करते आ रहा था। एक बीघा का ये प्लॉट इसी सेवादारी का ईनाम था। खेत के एक - एक पोर में गोविंद का मेहनत और पसीने की खुशबू आती थी। कोई भी इसके खेत को अलग से पहचान सकता था। खोजने पर भी खेतो में एक भी खर पतवार मिलना मुश्किल था। यही धरती माता उसके दो बच्चो का पालनहार थी। ऊपर से मेघ बरस रहे थे और नीचे खेतो में गोविंद मस्त होकर कुदाल चला रहा था। वह बहुत खुश था। इसी बीच किसी की आवाज़ से गोविंद चौंक गया। "अरे। ये तो अपने खेत के मालिक रघुराज बाबू है। अभी अचानक इनका यहां कैसे आना हुआ।"" गोर लागी मालिक... " कहते हुए गोविंद खेत से बाहर निकलकर मेंड पर रघुराज बाबू के सामने खड़ा था।
" कोई बात हई का मालिक.....सशंकित गोविंद ने पूछ बैठा।
रघुराज बाबू थोड़ा गंभीर होते हुए बोले, "गोविंद इस साल तुम खेती नहीं करोगे।" गोविंद के पांव के नीचे से मानो धरती खिसक गई। "ऐसा है गोविंद ...कि इसमें एक फैक्टरी लगेगी।"
" लेकिन मालिक ....मेरा क्या होगा...?" आंखो में एक आशा लिए हुए गोविंद ने बोला।
"अरे गोविंद घबराओ नहीं। इसी फैक्टरी में तुम्हारी नौकरी लग जाएगी।"
गोविंद के आंखो में थोड़ी सी उम्मीद की किरण प्रस्फुटित होते दिखाई दी। एक आशा भरी विश्वास के साथ वह घर लौट गया। आज तीन साल हो गए। फैक्टरी से उत्पादन भी शुरू हो गया। लेकिन गोविंद आज नौकरी की उम्मीद में टकटकी लगाए बैठा है। जब वह फैक्टरी के तरफ जाता है, उसे पुरानी यादें सताने लगती है। फैक्टरी से निकल रहे काले धुओं का गुब्बार उसके उम्मीदों को धुआं- धुआं कर देता है। अब तो गोविंद और उसके बच्चे की अधिकतर रात दो जून की रोटी के इंतजार में ही बीत जाता है।"
मौलिक एवं स्वरचित
राजीव नयन कुमार