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Saturday, August 8, 2020

टूटते बिखरते सपने

 

टूटते बिखरते सपने
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    कुसुमपुर गांव में राघव नाम के एक व्यक्ति  अपनी पत्नी दौलती और दो बच्चों के साथ रहता था। वह बहुत गरीब था। मजदूरी के अलावे  जीविका के नाम पर उसके पाास  सिर्फ एक गाय थी। उस गाय को राघव प्यार से हीरामनी कह कर बुलाता था।  गाय के दूध से उसे  अतिरिक्त आमदनी  हो जाती थी। वह इसी गाय के सहारे अपने जीवन में ऊंचे ऊंचे सपने देखा करता था। गाय ही उसके लिए सब कुछ थी। राघव हमेशा दोनों बच्चो को पढ़ा लिखाकर अफसर बनाने का सपना देखता रहता था। 
       समय के साथ बच्चो की पढ़ाई और जीवन की  गाड़ी पटरी पर चल रही थी। इसी बीच गांव में खबर फैली कि अपने देश में एक चीनी बीमारी कोरोना आ गया है। देखते ही देखते कोरोना गांव में भी आ गया। सारे देश में लॉक डाउन हो गया।  चारो तरफ काम धंधा बंद हो गया। घर में जो भी थोड़ा बहुत बचाकर रखा था, वो भी समाप्त हो गया था। चार महीने के बाद हीरामनी बच्चे को जन्म देती तो सब ठीक हो जाता, लेकिन यहां तो एक - एक दिन काटना मुश्किल हो रहा था। अब तो राघव को कुछ समझ में नहीं आ रहा था, कि वो क्या करें। उसके सारे सपने  आंखो के सामने बिखरते नजर आ रहे थे। एक तरफ बच्चो की पढ़ाई बाधित हुई, तो दूसरी तरफ अपने प्राणों से प्रिय हीरामनी को भरपूर खाना भी नहीं दे पा रहा था। 
    उदास राघव हीरामनी के पास बैठा हुआ था, तभी उनके बच्चे आकर बोल पड़े," बापू ..बापू...मुझे भी मोबाइल खरीद दो ना। हम भी ऑनलाइन पढ़ाई करेंगे। "
    गांव के कुछ बच्चे  ऑनलाइन ही पढ़ाई कर रहे थे।  राघव के पास इतने पैसे नहीं थे, कि वह मोबाइल खरीद सके। लॉक डाउन में वह दाने - दाने को मोहताज था। फिर भी बच्चों को सांत्वना देते हुए राघव ने बोला,
" हां.....हां बेटा ! खरीद दूंगा। तुम चिंता नहीं करो बेटा। जा ... जा अभी खेलो।"
बच्चो को तो राघव बोल दिया, परंतु  बच्चो के भविष्य को लेकर मन में एक पीड़ा सी उठ रही थी। वह हीरामनी की आंखो में झांककर उससे सवाल कर रहा था कि, "बोल हीरामनी अब कैसे चलेगी ज़िन्दगी ? अब बच्चो के भविष्य का क्या होगा ?" हीरामनी के आंखो में आंसू अपने मालिक की व्यथा को व्यक्त करने के लिए काफी था।
" सुनते हो जी.... घर में अब कुछ नहीं बचा है।" दौलती आकर राघव से प्रश्नभरी लहजे में कहा।
"हां.. ..हां....देखता हूं......कहीं से कोई व्यवस्था करके.......अरे...अभी कोई उधार भी नहीं देता है।,"
" मैं तो कहती हूं  जी...हीरामनी को बेच क्यों नहीं देते ? कुछ दिन तो घर का खर्च चलेगा। अब तो घर में चारा भी नहीं है। अपने खाने की व्यवस्था करोगे, कि इसकी चारे की। खूंटा पर मर गया तो गौहत्या लगेगी वो अलग। "
रघु के दिल में धक से लगा। वह सोचने लगा । कितना मेहनत से थोड़े थोड़े पैसा इकठ्ठा कर हीरामनी को मंगरा हाट से खरीदकर लाया था। यही दौलती घी के दीया और सिंदूर लेकर घर से बाहर दौड़ती हुई, हीरामनी के स्वागत में आई थी। समय क्या नहीं करा देता है। अब तो हीरामनी के बिना एक पल अलग होने की सोच भी नहीं सकता।
   " सोच क्या रहे हो ? अब कोई व्यवस्था करो नहीं तो घर का चूल्हा भी नहीं जलेगा।" झुंझलाते हुए  दौलती घर के भीतर चली गई।
  राघव अब दिल पर पत्थर रखकर हीरामनी को बेचने का मन बना लिया। हाट बाजार तो सब बंद है। गांव के ही बलेशर सेठ के पास गिरवी रख देना ठीक रहेगा। कम से कम कभी - कभी हीरामनी को अपनी आंखो से देख तो लेगा।
   सुबह सुबह राघव हीरामनी को लेकर बालेशर सेठ के घर पहुंच गया। चालाक सेठ को राघव की मजबूरी को समझते देर न लगा। काफी मोल - भाव के बाद ग्यारह हजार रुपया दाम तय हुआ। गाय के पगहा (रस्सी) बलेशर सेठ के हांथो में सौंपकर, राघव आंखो में आंसू लिए हुए  तेज़ी से मुड़ गया। हीरामनी की आवाज़ उसके कानों में गूंज रही थी। हृदय फटा जा रहा था। ग्यारह हजार रुपयों में बच्चो की पढ़ाई के लिए मोबाइल, घर का खर्चा, बकाया आदि का हिसाब लगाते हुए राघव को कुछ नहीं सूझ रहा था। डबडबाई आंखो में धूमिल सपना लिए हुए वह धीरे - धीरे घर  के तरफ बढ़ रहा था।

 मौलिक एवं स्वरचित
राजीव नयन कुमार (शिक्षक)
मध्य विद्यालय खरांटी, ओबरा, औरंगाबाद
दूरभाष - 9835435502

Wednesday, July 22, 2020

विडंबना

लघुकथा : विडंबना
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गांव का मंदिर..... मंदिर के प्रांगण में  वो बूढ़ा पीपल का पेड़....... पेड़ के नीचे ताश खेलते लोग आपस में बातें कर रहे थे। ये वही लोग थे, जो कुछ दिन पहले लॉक डाउन में विभिन्न प्रदेशों से अपने गांव में वापस लौटे थे। गांव में काम के अभाव में, वे अभी भी बेरोजगार थे। कुछ को मनरेगा में काम मिला, तो कुछ को खेतों में। लेकिन अधिकतर के पेट में अभी भी आग लगी  हुई थी। अब  कोरोना पर पेट की भूख का भारी पड़ना  स्वाभाविक ही  था। ताश की  पत्तियों को फेंटते हुए चनेसर ने बोला, 
" कल जो कंपनी की बस आ रही है, उस बारे में तुम्हारा क्या विचार है माधो।"
" मैं तो किसी भी हाल में जाऊंगा चनेसर। अब पेट की भूख बरदाश्त नहीं होती। वैसे भी कंपनी तीन महीने का एडवांस दे रही है।"
" जाने का विचार तो मैं भी कर रहा हूं माधो। " चनेसर बुझे मन से कुछ सोचते हुए बोला।
महानगर से लौटते समय चनेसर ने कसम खाई थी, कि अब महानगर कभी वापस नहीं जाएगा। पैर के छाले कुछ दिन तक टीस बनकर याद भी दिलाता रहा। सोचा था, गांव में ही मेहनत मजूरी करूंगा। परंतु पेट की आग रूपी भट्ठी में सारे विचार जलकर खाक हो गए। अब तो कंपनी वाले सैलरी भी बढ़ाकर दे रहे हैं। ए सी गाड़ी की व्यवस्था अलग से।
"ठीक है माधो, मैं  भी तुम्हारे साथ महानगर चलूंगा। अरे भाई ! यहां भी मरना और वहां भी मरना।"  
इस बार ताश की पत्तियों को मिलाते हुए चनेसर ने धीरे से निर्णयात्मक भाव में बोला।
"ठीक है तो कल सुबह तैयार होकर इसी पेड़ के पास चले आना चनेसर।" ताश के पत्तियों को समेटते हुए माधव खड़ा हो गया।
चनेसर और माधव अपने सामान के साथ मंदिर वाले पीपल के पेड़ के पास सुबह - सुबह पहुंच गए। कंपनी की ए सी गाड़ी पहले से ही लगी हुई थी। जोगपट्टी के पदारथ, भटोपुर के परीखन, लेमुआ के शिवशंकर, पंडित टोला के जीतन मिश्र आदि पूर्व से ही बस में अपनी जगह लेकर बैठे हुए थे। चनेसर और माधव भी बस में बैठ गए। कंपनी के तरफ से तीन महीने के एडवांस में जो भी मिला, उसे परिवार को सुपुर्दकर चनेसर और माधव संघर्ष के सफर में निकल गए। भूख और कोरोना ने ज़िन्दगी को अजीब विडंबना में डाल दिया था। अंततः कोरोना और भूख में, जीत भूख की ही हुई। गाड़ी जैसे जैसे आगे बढ़ रही थी , वैसे वैसे गांव और वहां की स्मृतियां पुनः विस्मृत होते जा रहा था। सिर्फ दिखाई दे रहा था तो बस का धुआं।

मौलिक एवं अप्रकाशित
राजीव नयन कुमार (शिक्षक)
मध्य विद्यालय खरांटी, ओबरा, औरंगाबाद
दूरभाष 9835435502



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Tuesday, June 2, 2020

बदल गई ज़िन्दगी


बदल गई ज़िन्दगी
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आवासन केंद्र पर मोहन का अंतिम दिन था। तेरह दिन से  मोहन अपने  गांव के विद्यालय में बने आवासन केंद्र (क्वारेंटाइन हेतु ) पर रह रहा था। साथ  में उसकी पत्नी रमा और दो बच्चे भी थे। विद्यालय में प्रवेश करते ही वो बचपन की यादों में खोता चला गया। मोहन को पढ़ने में मन नहीं लगता था। मास्टर जी की एक - एक बात याद करते हुए मोहन पश्चाताप कर रहा था। यदि मास्टरजी की सलाह मान लेता तो, आज ये दिन ना देखना पड़ता। उन दिनों खूब मौज मस्ती होती थी। दीपक, नरेश, छोटन उसके बचपन के साथी थे।  आम का पेड़ आज भी  उन दिनों की गवाही के लिए विद्यालय के प्रांगण में चुपचाप खड़ा है। धीरे धीरे समय बीतता गया और मोहन जैसे - तैसे आठवीं पास होकर बेरोजगार हो गया। घर में अशिक्षा और गरीबी उसे वक्त से पहले ही जवान बना दिया था। गांव में ही रहकर अपने पिताजी के साथ मजदूरी करने निकल जाता था। समय बीतता गया। समय के साथ मोहन की शादी भी हो गई और माता पिता चल बसे। गांव में काम की कमी और भेदभाव का दंश झेलना मुश्किल हो रहा था।
        एक दिन पत्नी के साथ काम की खोज में दिल्ली चला आया। वहां भेेेदभाव के दंश से मुक्ति मिली और एक कारखाने में छोटा सा काम भी मिल गया। वह अब अपने परिवार के  साथ खुशी - खुशी जीवन यापन कर रहा था।दोनों बच्चे का जन्म भी दिल्ली में ही हुआ। अचानक  लॉक डाउन होने से मोहन पुनः बेरोजगार हो गया।  एक माह तो वह किसी तरह गुजारा किया। अब उसके पास शेष पांच सौ रुपए ही बचे थे। परिस्थिति का मारा मोहन, पत्नी और दोनों बच्चो के साथ पैदल ही अपने गांव की ओर चल दिया। जब बात जान पर आ जाती है, तब सभी समस्याएं अपने आप छोटी लगने लगती है।  सीने में दर्द को समेटे मोहन गांव की  तरफ धीरे - धीरे बढ़ रहा था।  गांव और शहर रूपी किनारो के बीच मोहन झूल रहा था । भीड़ की लहरों में मोहन अपने आप को असहाय छोड़ दिया। जनसमूह की धारा में मोहन अपने परिवार के साथ धीरे-धीरे मीलो लंबी रास्ते को नापता जा  रहा था। हजारों प्रश्न मस्तिष्क में बिजली की तरह कौंध रही थी। गांव में  बड़जन की धौंस में कम से कम अपनापन तो होता था। यहां शहर में तो कोई किसी को पहचानता भी नहीं। शहरों में सिर्फ काम से ही मतलब रखते है। मोहन ख्यालों के अतल गहराइयों में समाता चला गया । टन.. टन....नाश्ते की घंटी के साथ ही मोहन की तंद्रा टूटी। कितना बदलाव आ गया है विद्यालय और अपने गांव में। गांव के चालितर काका ने आकर बोला था, "घबराओ नहीं मोहन.....सब ठीक हो जाएगा। बस चौदह दिनों की ही तो बात है।" इन शब्दों के साथ ही पैर के छाले से उठती हुई दर्द एक मिनट में समाप्त हो गया था।  इन्हीं शब्दों को तो सुनने के लिए कान तरस गई थी दिल्ली में। चौदह दिनों में जब मास्टरजी ने विधालय के योजनाओं एवम् बच्चो की पढ़ाई के बारे में बताए, तो मोहन के सामने एक नया सवेरा अपनी बाहें खोले आगोश में लेने के लिए तैयार था। उसके बच्चे की नामांकन की भी बात हो गई थी। सरकार के द्वारा जॉब कार्ड की भी बात की जा रही थी। विद्यालय में माईक पर बज रहे देशभक्ति गीत "मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे मोती".... ....की धुन पर मोहन झूमने लगा था। मन ही मन सोंच रहा था कि अब नहीं दिल्ली जाना। अपने बच्चो को यही सरकारी विद्यालय में पढ़ाएंगे और अपनी गांव की मिट्टी में अपना पसीना बहाकर सोना उपजाएंगे।
मौलिक एवं अप्रकाशित
राजीव नयन कुमार
रा०म०विद्यालय खरांटी
ओबरा, औरंगाबाद
दूरभाष 9835435502

Thursday, March 19, 2020

ज़िन्दगी
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ज़िन्दगी क्या है ?
ज़िन्दगी एक बीज है,
बंधनों के बीच अंकुरित,
आकांक्षाओं के बीच पल्लवित,
अंकुरण और पल्लवन के बीच,
कभी कभी मुरझा जाना।
ज़िन्दगी क्या है ? 
ज़िन्दगी एक सुबह है,
आशाओं के बीच प्रस्फुटित,
अपेक्षाओं के बीच पुष्पित,
आशाओं और अपेक्षाओं बीच,
कभी कभी कुम्हला जाना।
ज़िन्दगी क्या है ?
ज़िन्दगी एक शाम है,
उम्मीदों के बीच आशान्वित,
अपनों के बीच उपेक्षित,
उम्मीदों और अपेक्षाओं के बीच,
सूरज की तरह ढल जाना।
मौलिक एवं अप्रकाशित
राजीव नयन कुमार

Friday, January 10, 2020

दीपावली

दीपावली

मिट्टी के दिये कैसे है ? एक सभ्य व्यक्ति हाथ में झोला लिए दियेवाली से पूछा।पच्चीस रूपये सैकड़ा बेचा है बाबूजी। आपको बीस रूपये सैंकड़ा लगा दूंगी। नहीं नहीं पन्द्रह रूपये सैंकड़े देना है तो दे दो।दिये बनाने में बहुत परिश्रम करने पड़ते हैं बाबूजी.....बेवसी भरे लहजे में दियेवाली बुढ़िया ने बोली। रमेश कुछ दूर पर खड़ा उनकी बातों को सुन रहा था। वह अभी अभी दीपावली के सामान के लिए निकला था। दियेवाली के चेहरे पर झुरिया साफ़ साफ़ दिखाई दे रहा थी। उन चेहरे के झुरियों से बेवसी और लाचारी झलक रही थी। काफी रिरियाने और घिघियाने के बाद आखिर में अपना बड़ा दिल दियेवाली ने दिखाई। पंद्रह रूपये सैंकड़े के हिसाब से पचास दीये खरीदकर मात्र सात रूपये भुगतान कर वह व्यक्ति चला गया।रमेश मन ही मन सोंच रहा था, आखिर ये कैसी दिवाली ? वह आकर दियेवाली बुढ़िया से बोला, माता जी पुरे दिए का क्या लोगी ? बुढ़िया आश्चर्यभरी नज़रों से रमेश को देखते हुए बोली, सभी दिये दे दूँ बेटा ? हाँ ...हाँ। तीस रूपये दे देना बेटा। दो सौ से अधिक दीये है। बुढ़िया थोड़े संकोच भरी शब्दों में बोली। रमेश पचास रूपये देकर सभी दिए लेकर चल दिया। बुढ़िया ह्रदय से दुआ देते हुए अपने सामान को समेटने लगी। रमेश के चेहरे पर संतोष के भाव थे।
मौलिक एवं अप्रकाशित
राजीव नयन कुमार 
ग्राम + पोस्ट- ओबरा
जिला - औरंगाबाद (बिहार)
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दूरभाष 9835435502