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Friday, January 10, 2020

दीपावली

दीपावली

मिट्टी के दिये कैसे है ? एक सभ्य व्यक्ति हाथ में झोला लिए दियेवाली से पूछा।पच्चीस रूपये सैकड़ा बेचा है बाबूजी। आपको बीस रूपये सैंकड़ा लगा दूंगी। नहीं नहीं पन्द्रह रूपये सैंकड़े देना है तो दे दो।दिये बनाने में बहुत परिश्रम करने पड़ते हैं बाबूजी.....बेवसी भरे लहजे में दियेवाली बुढ़िया ने बोली। रमेश कुछ दूर पर खड़ा उनकी बातों को सुन रहा था। वह अभी अभी दीपावली के सामान के लिए निकला था। दियेवाली के चेहरे पर झुरिया साफ़ साफ़ दिखाई दे रहा थी। उन चेहरे के झुरियों से बेवसी और लाचारी झलक रही थी। काफी रिरियाने और घिघियाने के बाद आखिर में अपना बड़ा दिल दियेवाली ने दिखाई। पंद्रह रूपये सैंकड़े के हिसाब से पचास दीये खरीदकर मात्र सात रूपये भुगतान कर वह व्यक्ति चला गया।रमेश मन ही मन सोंच रहा था, आखिर ये कैसी दिवाली ? वह आकर दियेवाली बुढ़िया से बोला, माता जी पुरे दिए का क्या लोगी ? बुढ़िया आश्चर्यभरी नज़रों से रमेश को देखते हुए बोली, सभी दिये दे दूँ बेटा ? हाँ ...हाँ। तीस रूपये दे देना बेटा। दो सौ से अधिक दीये है। बुढ़िया थोड़े संकोच भरी शब्दों में बोली। रमेश पचास रूपये देकर सभी दिए लेकर चल दिया। बुढ़िया ह्रदय से दुआ देते हुए अपने सामान को समेटने लगी। रमेश के चेहरे पर संतोष के भाव थे।
मौलिक एवं अप्रकाशित
राजीव नयन कुमार 
ग्राम + पोस्ट- ओबरा
जिला - औरंगाबाद (बिहार)
पिन कोड 824124
दूरभाष 9835435502