बदल गई ज़िन्दगी
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आवासन केंद्र पर मोहन का अंतिम दिन था। तेरह दिन से मोहन अपने गांव के विद्यालय में बने आवासन केंद्र (क्वारेंटाइन हेतु ) पर रह रहा था। साथ में उसकी पत्नी रमा और दो बच्चे भी थे। विद्यालय में प्रवेश करते ही वो बचपन की यादों में खोता चला गया। मोहन को पढ़ने में मन नहीं लगता था। मास्टर जी की एक - एक बात याद करते हुए मोहन पश्चाताप कर रहा था। यदि मास्टरजी की सलाह मान लेता तो, आज ये दिन ना देखना पड़ता। उन दिनों खूब मौज मस्ती होती थी। दीपक, नरेश, छोटन उसके बचपन के साथी थे। आम का पेड़ आज भी उन दिनों की गवाही के लिए विद्यालय के प्रांगण में चुपचाप खड़ा है। धीरे धीरे समय बीतता गया और मोहन जैसे - तैसे आठवीं पास होकर बेरोजगार हो गया। घर में अशिक्षा और गरीबी उसे वक्त से पहले ही जवान बना दिया था। गांव में ही रहकर अपने पिताजी के साथ मजदूरी करने निकल जाता था। समय बीतता गया। समय के साथ मोहन की शादी भी हो गई और माता पिता चल बसे। गांव में काम की कमी और भेदभाव का दंश झेलना मुश्किल हो रहा था।
एक दिन पत्नी के साथ काम की खोज में दिल्ली चला आया। वहां भेेेदभाव के दंश से मुक्ति मिली और एक कारखाने में छोटा सा काम भी मिल गया। वह अब अपने परिवार के साथ खुशी - खुशी जीवन यापन कर रहा था।दोनों बच्चे का जन्म भी दिल्ली में ही हुआ। अचानक लॉक डाउन होने से मोहन पुनः बेरोजगार हो गया। एक माह तो वह किसी तरह गुजारा किया। अब उसके पास शेष पांच सौ रुपए ही बचे थे। परिस्थिति का मारा मोहन, पत्नी और दोनों बच्चो के साथ पैदल ही अपने गांव की ओर चल दिया। जब बात जान पर आ जाती है, तब सभी समस्याएं अपने आप छोटी लगने लगती है। सीने में दर्द को समेटे मोहन गांव की तरफ धीरे - धीरे बढ़ रहा था। गांव और शहर रूपी किनारो के बीच मोहन झूल रहा था । भीड़ की लहरों में मोहन अपने आप को असहाय छोड़ दिया। जनसमूह की धारा में मोहन अपने परिवार के साथ धीरे-धीरे मीलो लंबी रास्ते को नापता जा रहा था। हजारों प्रश्न मस्तिष्क में बिजली की तरह कौंध रही थी। गांव में बड़जन की धौंस में कम से कम अपनापन तो होता था। यहां शहर में तो कोई किसी को पहचानता भी नहीं। शहरों में सिर्फ काम से ही मतलब रखते है। मोहन ख्यालों के अतल गहराइयों में समाता चला गया । टन.. टन....नाश्ते की घंटी के साथ ही मोहन की तंद्रा टूटी। कितना बदलाव आ गया है विद्यालय और अपने गांव में। गांव के चालितर काका ने आकर बोला था, "घबराओ नहीं मोहन.....सब ठीक हो जाएगा। बस चौदह दिनों की ही तो बात है।" इन शब्दों के साथ ही पैर के छाले से उठती हुई दर्द एक मिनट में समाप्त हो गया था। इन्हीं शब्दों को तो सुनने के लिए कान तरस गई थी दिल्ली में। चौदह दिनों में जब मास्टरजी ने विधालय के योजनाओं एवम् बच्चो की पढ़ाई के बारे में बताए, तो मोहन के सामने एक नया सवेरा अपनी बाहें खोले आगोश में लेने के लिए तैयार था। उसके बच्चे की नामांकन की भी बात हो गई थी। सरकार के द्वारा जॉब कार्ड की भी बात की जा रही थी। विद्यालय में माईक पर बज रहे देशभक्ति गीत "मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे मोती".... ....की धुन पर मोहन झूमने लगा था। मन ही मन सोंच रहा था कि अब नहीं दिल्ली जाना। अपने बच्चो को यही सरकारी विद्यालय में पढ़ाएंगे और अपनी गांव की मिट्टी में अपना पसीना बहाकर सोना उपजाएंगे।
एक दिन पत्नी के साथ काम की खोज में दिल्ली चला आया। वहां भेेेदभाव के दंश से मुक्ति मिली और एक कारखाने में छोटा सा काम भी मिल गया। वह अब अपने परिवार के साथ खुशी - खुशी जीवन यापन कर रहा था।दोनों बच्चे का जन्म भी दिल्ली में ही हुआ। अचानक लॉक डाउन होने से मोहन पुनः बेरोजगार हो गया। एक माह तो वह किसी तरह गुजारा किया। अब उसके पास शेष पांच सौ रुपए ही बचे थे। परिस्थिति का मारा मोहन, पत्नी और दोनों बच्चो के साथ पैदल ही अपने गांव की ओर चल दिया। जब बात जान पर आ जाती है, तब सभी समस्याएं अपने आप छोटी लगने लगती है। सीने में दर्द को समेटे मोहन गांव की तरफ धीरे - धीरे बढ़ रहा था। गांव और शहर रूपी किनारो के बीच मोहन झूल रहा था । भीड़ की लहरों में मोहन अपने आप को असहाय छोड़ दिया। जनसमूह की धारा में मोहन अपने परिवार के साथ धीरे-धीरे मीलो लंबी रास्ते को नापता जा रहा था। हजारों प्रश्न मस्तिष्क में बिजली की तरह कौंध रही थी। गांव में बड़जन की धौंस में कम से कम अपनापन तो होता था। यहां शहर में तो कोई किसी को पहचानता भी नहीं। शहरों में सिर्फ काम से ही मतलब रखते है। मोहन ख्यालों के अतल गहराइयों में समाता चला गया । टन.. टन....नाश्ते की घंटी के साथ ही मोहन की तंद्रा टूटी। कितना बदलाव आ गया है विद्यालय और अपने गांव में। गांव के चालितर काका ने आकर बोला था, "घबराओ नहीं मोहन.....सब ठीक हो जाएगा। बस चौदह दिनों की ही तो बात है।" इन शब्दों के साथ ही पैर के छाले से उठती हुई दर्द एक मिनट में समाप्त हो गया था। इन्हीं शब्दों को तो सुनने के लिए कान तरस गई थी दिल्ली में। चौदह दिनों में जब मास्टरजी ने विधालय के योजनाओं एवम् बच्चो की पढ़ाई के बारे में बताए, तो मोहन के सामने एक नया सवेरा अपनी बाहें खोले आगोश में लेने के लिए तैयार था। उसके बच्चे की नामांकन की भी बात हो गई थी। सरकार के द्वारा जॉब कार्ड की भी बात की जा रही थी। विद्यालय में माईक पर बज रहे देशभक्ति गीत "मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे मोती".... ....की धुन पर मोहन झूमने लगा था। मन ही मन सोंच रहा था कि अब नहीं दिल्ली जाना। अपने बच्चो को यही सरकारी विद्यालय में पढ़ाएंगे और अपनी गांव की मिट्टी में अपना पसीना बहाकर सोना उपजाएंगे।
मौलिक एवं अप्रकाशित
राजीव नयन कुमार
रा०म०विद्यालय खरांटी
ओबरा, औरंगाबाद
दूरभाष 9835435502