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Tuesday, December 25, 2018

अन्धविश्वास

लघुकथा
अन्धविश्वास
हु.....हु......खी.....खी.....आवाज़ के साथ सुबह-सुबह मुरारी की नींद खुल गयी। आंख मलते हुए मन ही मन सोंच रहा था, "ये आवाज़ कैसी?" उत्सुकतावश बालकनी से बाहर झाँका। पडोसी रमेशर बाबु के घर अहाते में पाँच सात लोगों का जमावड़ा लगा था। इनके बीच ढाई फुट के लोहे के जंजीर में बंधी बंदरिया पाँच फुट के बाँस के खम्भे पर चढ़ने का प्रयास करता हुआ हु....हु....खी...खी..  की आवाज़ निकाल रही थी। आस पड़ोस से पता चला कि रमेशर बाबु के घर घट रही घटनाओं का कारण  प्रेतबाधा है। एक महात्मा ने प्रेतबाधा से मुक्ति के लिए बंदरिया पोसने के लिए कहा है। अब तो  बंदरिया की हु....हु....खी..खी... की आवाज़ मुरारी के लिए अलार्म घडी से कम नहीं थी। इसी आवाज़ के साथ सुबह सुबह मुरारी की नींद टूटती। वह एक बार बालकनी में झाँककर जरुर देखता। बंदरिया की आवाज़ में उसे क्रंदन ही सुनाई पड़ती। आज मुरारी देर से उठा। बंदरिया की आवाज़ ना सुनकर आँख मलते हुए बालकनी से झाँका। रमेशर बाबु के अहाते में भीड़ कैसी....? ये बंदरिया कहाँ गई.... ? कही भाग तो नहीं गई......? मुरारी के मन में कई विचार एक साथ कौंध गई। उत्सुकतावश रमेशर बाबु के घर जाकर भीड़ में शामिल हो गया। बंदरिया मर चुकी थी।भीड़ से तरह तरह की प्रतिक्रिया आ रही थी। प्रेतबाधा दूर करते करते अन्धविश्वास में बंदरिया अपनी जान गवाँ दी।  
 मौलिक एवं अप्रकाशित।
राजीव नयन कुमार(वर्तमान में शिक्षक, म0वि0 खरांटी पूर्व रंगकर्मी पटना रंगमंच, बी हाई ग्रेड ड्रामा आर्टिस्ट आकाशवाणी पटना)

Sunday, December 23, 2018

मुखौटा

छोटी कहानी
मुखौटा
शाम होते ही मनोहर ने झोला उठाया और शब्जी के लिये बाज़ार जाने के क्रम बोला, "मधु बाज़ार से कुछ और तो नहीं लाना है ? दरजी के यहाँ से सिले हुए कपडे लेते आना। आज ही देने के लिए बोला था। स्वेटर बुन रही मधु ने धीमी आवाज़ में प्रत्युतर दी। उलझे हुए उन को सुलझाते हुए मधु मानो जीवन की रहस्य सुलझाने की कोशिश कर रही थी। इसी कार्य के कारण मनोहर आज निचले रास्ते से जा रहा था। यह रास्ता सुनसान रहता है। कुछ ही दूर चला था कि रास्ते में उस पुरानी मकान जो अब खंडहर में तब्दील हो चूका था, वहां से कुछ युवको की फुसफुसाहट की आवाज़ सुनाई दी। मनोहर अचानक एक क्षण रूककर उधर देखा। वह चौंक गया। उसमे से एक युवक को वह अच्छी तरह पहचान गया था। अरे। ये तो वही युवक है जिसके लिए मैं अपनी पत्नी मधु से झगड़ बैठा था।चौराहे पर भीख मांगता है। बजबजाती ज़ख्म के ऊपर मलहम का लेप लगाकर लोगो से अपने पेट की दुहाई देता और बदले में लोग उसे ख़ाली पड़े कटोरे में कुछ पैसे डाल देते। मैंने भी उस दिन ऐसा ही किया था। अंतर सिर्फ इतना कि सभी लोग सिक्का डाल रहे थे,  मैंने उसे सौ रुपये का नोट दे दिया था। मधु ने न जाने कितनी बात सूना डाली थी, "ये लोग भिखारी नहीं है, भीख मांगना इनका पेशा है, इनके घाव नकली है, गुस्से में ना जाने मधु ने क्या क्या बोली थी। मैंने मधु को शांत करते हुए सिर्फ इतना ही कह सका था कि इसको इसकी आवश्यकता है। अभी वो इस सुनसान खंडहर में अपना वेष भूषा ऐसे बदल रहा है मानो एक मंजा हुआ कलाकार हो। जख्म का तो नामोनिशान नहीं था। मैं ठगा सा महसूस कर रहा था।इसने तो विश्वास और इंसानियत की हत्या कर डाली। मनोहर अन्दर ही अन्दर सोंच रहा था कि आज के इंसान मुखौटा बदलने में कितना माहिर हो गया है।बुझे मन से सोचता हुआ मनोहर बाज़ार की तरफ बढ़ गया।

मौलिक एवं अप्रकाशित
राजीव नयन कुमार

Saturday, December 22, 2018

अफ़सोस

अफ़सोस
"मैं अन्दर आ सकती हूँ सर।"
"कौन ? प्रिया तुम।फिर से लेट।विद्यालय समय से आया करो।समझाते हुए मास्टर जी ने वर्ग कक्ष में प्रवेश की अनुमति दी परन्तु बैठने की नहीं। देर से आने का कारण बताओ ।" मास्टर जी ने सख्त शब्दों में कहा।
प्रिया निरुतर चुपचाप खड़ी रही ।
"सर जी......। सर......जी।"
अगले बेंच पर बैठी अंजली कुछ समझाने की कोशिश की।
"हाँ हाँ बोलो अंजली।"
"सर जी प्रिया खाना बनाकर आती है और......"
"और क्या अंजली......?"
"इसकी मम्मी नहीं है सर जी.....।"
क्या....????? मास्टर जी बिल्कुल आवाक रह गए।
मास्टर जी अफ़सोस भरी एक लम्बी साँस लेते हुए प्रिया को बैठने के लिए कहा।
स्वरचित
मौलिक एवं अप्रकाशित
राजीव नयन कुमार
ओबरा, औरंगाबाद (बिहार)
दूरभाष 9835435502

Friday, December 14, 2018

बुधिया

 #  बुधिया #

 क्रंदन एवं रुदन के समवेत स्वर से हडबडाकर हरिमोहन उठकर बैठ गया। रात के दो पहर ही बीता था।चारों तरफ घूप अँधेरा पसरा हुआ । रोने की आवाज़ वातावरण को भयावह बना रही थी। उस भयावह वातवरण  को बीच बीच में कुते अपनी आवाजो से सजा रहे थे, मानो यमराज का पदार्पण हो चूका हो।हरिमोहन करवट बदलते हुए किसी तरह रात काटा। सुबह होते ही पता चला कि ज़िन्दगी भर दो रोटी को तरसती बुधिया की माँ आज स्वर्ग सिधार गई थी। वही बुधिया, जिसकी आवाज़ आजतक कोई नहीं सुना।गरीबी की दंश झेलते हुए बड़ी हो रही थी। हमेशा चुपचाप रहती। कोई खाना दे दिया तो खा लिया। लोग उसे पागल कहते थे।परन्तु वो पागल थी नहीं। परिवार के नाम पर माँ और पिता बुझावन। पिता का प्यार बुधिया को कभी नहीं मिला।बुझावन दिन भर पी के टर्र रहता। इस संसार में माँ ही सब कुछ थी बुधिया की। हरिमोहन सोंच ही रहा था, कि राम नाम सत्य की आवाज घर से बाहर खिंच लाया। बाहर अर्थी पर सजी बुधिया की माँ और पीछे पीछे राम नाम सत्य करते हुए कुछ लोग। सबसे पीछे रोती हुई बुधिया चली जा रही थी। कहाँ चल गेले गे मैया.......की आवाज़ से मानो समस्त प्रकृति ही रो पड़ा हो।आज बुधिया की आवाज़ सब सुन रहे थे, परन्तु उसके समझने वाली आवाज़ हमेशा हमेशा के लिए शांत हो चुकी थी। हरिमोहन का ह्रदय अन्दर तक काँप उठा। अनेको यक्ष प्रश्न के साथ बुझे मन से हरिमोहन घर में प्रवेश किया। अभी भी उसके कानो में दूर जाती हुई बुधिया की धीमी होती आवाज़ सुनाई दे रही थी, कहाँ गेले गे मैया......

मौलिक एवं अप्रकाशित
राजीव नयन कुमार
शिक्षक एवं रंगकर्मी
ओबरा औरंगाबाद

Monday, December 3, 2018

बोझ

लघुकथा
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बोझ
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कॉल बेल की आवाज़ सुनते ही रमा दौड़ती हुई मुख्य दरवाज़े के तरफ भागी। सामने रमेश था। रमा के तबादले के सम्बन्ध में डी एम साहब से मिलकर लौटा था। क्या हुआ ? डी एम साहब से मुलाकात हुई ? कुछ बात बनी ....? कुछ बोलते क्यों नहीं ...? .......न जाने कितने प्रश्नों की झड़ी लगा दी रमा ने। रमेश घर में प्रवेश करते हुए सीधा अपने बेडरूम के तरफ गया। रमा पीछे पीछे आते हुए पुनः वही प्रश्न दुहराई,  कुछ बोलते क्यों नहीं जी......? वे तो तुम्हारे सहपाठी भी थे न। मिलने से इंकार कर दिए क्या....? एक लम्बी साँस लेते हुए रमेश धीरे से बोला, "हाँ...मुलाकात भी हुई और बात भी हुई...परन्तु.....?
परन्तु क्या ? रमा की उत्सुकुता रमेश की परन्तु पर आकर टिक गयी थी।
"अत्यधिक कार्य बोझ तले दबे अपने मित्र पर मैं एक और बोझ नहीं डाल सकता " कहते हुए रमेश निढाल सा विस्तर पर लेट गया।

मौलिक एवं अप्रकाशित
राजीव नयन कुमार
शिक्षक एवं रंगकर्मी
ओबरा, औरंगाबाद
दूरभाष 9835435502