लघुकथा
अन्धविश्वास
हु.....हु......खी.....खी.....आ वाज़ के साथ सुबह-सुबह मुरारी की नींद खुल गयी। आंख मलते हुए मन ही मन सोंच रहा था, "ये आवाज़ कैसी?" उत्सुकतावश बालकनी से बाहर झाँका। पडोसी रमेशर बाबु के घर अहाते में पाँच सात लोगों का जमावड़ा लगा था। इनके बीच ढाई फुट के लोहे के जंजीर में बंधी बंदरिया पाँच फुट के बाँस के खम्भे पर चढ़ने का प्रयास करता हुआ हु....हु....खी...खी.. की आवाज़ निकाल रही थी। आस पड़ोस से पता चला कि रमेशर बाबु के घर घट रही घटनाओं का कारण प्रेतबाधा है। एक महात्मा ने प्रेतबाधा से मुक्ति के लिए बंदरिया पोसने के लिए कहा है। अब तो बंदरिया की हु....हु....खी..खी... की आवाज़ मुरारी के लिए अलार्म घडी से कम नहीं थी। इसी आवाज़ के साथ सुबह सुबह मुरारी की नींद टूटती। वह एक बार बालकनी में झाँककर जरुर देखता। बंदरिया की आवाज़ में उसे क्रंदन ही सुनाई पड़ती। आज मुरारी देर से उठा। बंदरिया की आवाज़ ना सुनकर आँख मलते हुए बालकनी से झाँका। रमेशर बाबु के अहाते में भीड़ कैसी....? ये बंदरिया कहाँ गई.... ? कही भाग तो नहीं गई......? मुरारी के मन में कई विचार एक साथ कौंध गई। उत्सुकतावश रमेशर बाबु के घर जाकर भीड़ में शामिल हो गया। बंदरिया मर चुकी थी।भीड़ से तरह तरह की प्रतिक्रिया आ रही थी। प्रेतबाधा दूर करते करते अन्धविश्वास में बंदरिया अपनी जान गवाँ दी।
मौलिक एवं अप्रकाशित।
राजीव नयन कुमार(वर्तमान में शिक्षक, म0वि0 खरांटी पूर्व रंगकर्मी पटना रंगमंच, बी हाई ग्रेड ड्रामा आर्टिस्ट आकाशवाणी पटना)