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Sunday, December 23, 2018

मुखौटा

छोटी कहानी
मुखौटा
शाम होते ही मनोहर ने झोला उठाया और शब्जी के लिये बाज़ार जाने के क्रम बोला, "मधु बाज़ार से कुछ और तो नहीं लाना है ? दरजी के यहाँ से सिले हुए कपडे लेते आना। आज ही देने के लिए बोला था। स्वेटर बुन रही मधु ने धीमी आवाज़ में प्रत्युतर दी। उलझे हुए उन को सुलझाते हुए मधु मानो जीवन की रहस्य सुलझाने की कोशिश कर रही थी। इसी कार्य के कारण मनोहर आज निचले रास्ते से जा रहा था। यह रास्ता सुनसान रहता है। कुछ ही दूर चला था कि रास्ते में उस पुरानी मकान जो अब खंडहर में तब्दील हो चूका था, वहां से कुछ युवको की फुसफुसाहट की आवाज़ सुनाई दी। मनोहर अचानक एक क्षण रूककर उधर देखा। वह चौंक गया। उसमे से एक युवक को वह अच्छी तरह पहचान गया था। अरे। ये तो वही युवक है जिसके लिए मैं अपनी पत्नी मधु से झगड़ बैठा था।चौराहे पर भीख मांगता है। बजबजाती ज़ख्म के ऊपर मलहम का लेप लगाकर लोगो से अपने पेट की दुहाई देता और बदले में लोग उसे ख़ाली पड़े कटोरे में कुछ पैसे डाल देते। मैंने भी उस दिन ऐसा ही किया था। अंतर सिर्फ इतना कि सभी लोग सिक्का डाल रहे थे,  मैंने उसे सौ रुपये का नोट दे दिया था। मधु ने न जाने कितनी बात सूना डाली थी, "ये लोग भिखारी नहीं है, भीख मांगना इनका पेशा है, इनके घाव नकली है, गुस्से में ना जाने मधु ने क्या क्या बोली थी। मैंने मधु को शांत करते हुए सिर्फ इतना ही कह सका था कि इसको इसकी आवश्यकता है। अभी वो इस सुनसान खंडहर में अपना वेष भूषा ऐसे बदल रहा है मानो एक मंजा हुआ कलाकार हो। जख्म का तो नामोनिशान नहीं था। मैं ठगा सा महसूस कर रहा था।इसने तो विश्वास और इंसानियत की हत्या कर डाली। मनोहर अन्दर ही अन्दर सोंच रहा था कि आज के इंसान मुखौटा बदलने में कितना माहिर हो गया है।बुझे मन से सोचता हुआ मनोहर बाज़ार की तरफ बढ़ गया।

मौलिक एवं अप्रकाशित
राजीव नयन कुमार

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