लघुकथा
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बोझ
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कॉल बेल की आवाज़ सुनते ही रमा दौड़ती हुई मुख्य दरवाज़े के तरफ भागी। सामने रमेश था। रमा के तबादले के सम्बन्ध में डी एम साहब से मिलकर लौटा था। क्या हुआ ? डी एम साहब से मुलाकात हुई ? कुछ बात बनी ....? कुछ बोलते क्यों नहीं ...? .......न जाने कितने प्रश्नों की झड़ी लगा दी रमा ने। रमेश घर में प्रवेश करते हुए सीधा अपने बेडरूम के तरफ गया। रमा पीछे पीछे आते हुए पुनः वही प्रश्न दुहराई, कुछ बोलते क्यों नहीं जी......? वे तो तुम्हारे सहपाठी भी थे न। मिलने से इंकार कर दिए क्या....? एक लम्बी साँस लेते हुए रमेश धीरे से बोला, "हाँ...मुलाकात भी हुई और बात भी हुई...परन्तु.....?
परन्तु क्या ? रमा की उत्सुकुता रमेश की परन्तु पर आकर टिक गयी थी।
"अत्यधिक कार्य बोझ तले दबे अपने मित्र पर मैं एक और बोझ नहीं डाल सकता " कहते हुए रमेश निढाल सा विस्तर पर लेट गया।
मौलिक एवं अप्रकाशित
राजीव नयन कुमार
शिक्षक एवं रंगकर्मी
ओबरा, औरंगाबाद
दूरभाष 9835435502
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