देहरी
शादी के चार साल हो गए थे। इन चार सालो में रागिनी वह आँगन को भूल गयी थी जिस आँगन में अपने माता पिता के साथ बचपन बितायी थी। जिस माता पिता के गोद में पली बढ़ी वह सपना हो गया था। राजेश के माता पिता और रागिनी के माता पिता में दहेज़ को लेकर ऐसी कड़वाहट आयी कि रागिनी के लिए ससुराल मानो जेल हो गया था।
पिछली बार जब रागिनी आपनी माँ से बात की थी तो बोलते बोलते रो पड़ी थी।
"अब तुम मुझे भूल जाना माँ। ये लोग मुझे वहां नहीं आने देंगे।"
आज इतने दिनों के बाद रागिनी बड़ी हिम्मत जुटाकर बोली थी।
"कुछ दिन और रुक जाओ रागिनी। मैं माँ बाबूजी का दिल नहीं दुखा सकता।" संकोच करते हुए राजेश बोला।
"अच्छा। तुम्हारे माँ बाबुजी और मेरे.........मेरे कुछ नहीं।" इस प्रश्नभरी जबाब से राजेश बिल्कुल सकपका गया था।" मैंने तुम्हारे लिए सब कुछ बर्दास्त किया, तुम्हारे माता पिता के बनाये सारे नियम को स्वीकार किया, इन चार वर्षो से अपनी उस माँ का चेहरा तक नहीं देखी जिसने पाल पोसकर बड़ा किया और तुम.....? "
अपने बैग को ठीक करती हुई रागिनी एक साँस में बोल गयी। चार वर्षो की पीड़ा आज ज्वालामुखी बन कर लावा की तरह पिघलकर बाहर निकल रही थी। एक झटके में सारे नियम को तोड़ते हुए बैग उठाकर रागिनी अपने बीमार माता पिता से मिलने के लिए देहरी लांघ गई। एक क्षण में सारे नियमो से मुक्त होकर आन्तरिक सुकून महसूस कर रही थी। राजेश चुपचाप मूक खड़ा देखता रहा और रागिनी धीरे धीरे आँखों से ओझल हो गई।
मौलिक एवं अप्रकाशित
राजीव नयन कुमार
शिक्षक एवं रंगकर्मी
ओबरा औरंगाबाद
दूरभाष नो. 9835435502
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