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Friday, December 14, 2018

बुधिया

 #  बुधिया #

 क्रंदन एवं रुदन के समवेत स्वर से हडबडाकर हरिमोहन उठकर बैठ गया। रात के दो पहर ही बीता था।चारों तरफ घूप अँधेरा पसरा हुआ । रोने की आवाज़ वातावरण को भयावह बना रही थी। उस भयावह वातवरण  को बीच बीच में कुते अपनी आवाजो से सजा रहे थे, मानो यमराज का पदार्पण हो चूका हो।हरिमोहन करवट बदलते हुए किसी तरह रात काटा। सुबह होते ही पता चला कि ज़िन्दगी भर दो रोटी को तरसती बुधिया की माँ आज स्वर्ग सिधार गई थी। वही बुधिया, जिसकी आवाज़ आजतक कोई नहीं सुना।गरीबी की दंश झेलते हुए बड़ी हो रही थी। हमेशा चुपचाप रहती। कोई खाना दे दिया तो खा लिया। लोग उसे पागल कहते थे।परन्तु वो पागल थी नहीं। परिवार के नाम पर माँ और पिता बुझावन। पिता का प्यार बुधिया को कभी नहीं मिला।बुझावन दिन भर पी के टर्र रहता। इस संसार में माँ ही सब कुछ थी बुधिया की। हरिमोहन सोंच ही रहा था, कि राम नाम सत्य की आवाज घर से बाहर खिंच लाया। बाहर अर्थी पर सजी बुधिया की माँ और पीछे पीछे राम नाम सत्य करते हुए कुछ लोग। सबसे पीछे रोती हुई बुधिया चली जा रही थी। कहाँ चल गेले गे मैया.......की आवाज़ से मानो समस्त प्रकृति ही रो पड़ा हो।आज बुधिया की आवाज़ सब सुन रहे थे, परन्तु उसके समझने वाली आवाज़ हमेशा हमेशा के लिए शांत हो चुकी थी। हरिमोहन का ह्रदय अन्दर तक काँप उठा। अनेको यक्ष प्रश्न के साथ बुझे मन से हरिमोहन घर में प्रवेश किया। अभी भी उसके कानो में दूर जाती हुई बुधिया की धीमी होती आवाज़ सुनाई दे रही थी, कहाँ गेले गे मैया......

मौलिक एवं अप्रकाशित
राजीव नयन कुमार
शिक्षक एवं रंगकर्मी
ओबरा औरंगाबाद

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